घर की छत से दिखने वाली मेहरानगढ़ की वृक्षविहीन पहाड़ियों को हरा भरा करने का सपना देखा प्रसन्न पुरी गोस्वामी ने। पुत्र की स्मृति को अमृत स्वरूप देने के संकल्प ने उन्हें किसान वैज्ञानिक और पर्यावरण संत बना दिया। उनकी कहानी, उनकी जुबानी। राजस्थान की सूर्यनगरी जोधपुर में 1947 की 9 मार्च को साधारण परिवार में जन्म हुआ। पिताजी लाल पुरी राजमिस्त्री थे। मां मोहिनी देवी मेहनत मजदूरी कर घर चलाने में सहयोग करतीं। पढ़ाई के लिए पैसा जुटाने के लिए स्कूल की छुट्टियों में मजदूरी करता। जैसे तैसे एम.ए., एम.एड. किया। इस दौरान ही 1972 में ओमीदेवी से विवाह हुआ।
शिक्षा पूर्ण होने पर जोधपुर के निजी विद्यालय में शिक्षक का कार्य किया। दो पुत्रों प्रमोद और विनोद एवं पुत्री चेतना की पढ़ाई अच्छे से हुई, क्योंकि सितम्बर, 1974 में शिक्षक के रूप में सरकारी नौकरी लगी। जनवरी, 2008 में प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुआ। कभी सोचा नहीं था कि खेती किसानी मिशन बन जाएगा। हां, शिक्षक के रूप में गांवों में जो दिन बिताए, उनमें नवाचारी कृषि में मन रमने लगा। मेहरानगढ़ की पहाड़ियों के नीचे घर है। बचपन से इन पहाड़ियों को वृक्षविहीन देखा। सोचा करता कि ये पहाड़ियां हरी भरी हो जाएं तो कितनी सुन्दर लगेंगी। नौकरी के दौरान जोधपुर लौटता तो इस सोच को शक्ल देने की छुटपुट कोशिश करता।
समझी पहाड़ियों की प्रकृति
वैज्ञानिक दृष्टि से पहाड़ियों की प्रकृति को समझा। इनकी छोटी बड़ी दरारों का पता लगाने के लिए, दरारों पर घणिये से चोट मारते। इससे निकली विशेष प्रकार की ध्वनि से पता लगता कि दरार कितनी गहरी है। ज्यादा गहरी होने पर 2 गुणा 3 फुट का गहरा गड्ढा हथौड़े व छैनी की सहायता से बनाकर, उसमें पानी भरकर छोड़ा जाता। यदि पानी गड्ढे में समा गया तो वह जगह पेड़ लगाने योग्य है। मिट्टी भर कर वहां पौधे लगाते। ये पहाड़ियां गर्मी में फैलती और सर्दी में सिकुड़ती हैं, इसलिए दरारों में पानी से जड़ें बढ़तीं। वृक्षारोपण में स्थानीय प्रजाति के वृक्षों को प्रमुखता दी। चेक बांधों का निर्माण करवाया। जलस्तर बढ़ाने के लिए छोटी-छोटी नाड़ियां बनवाई। मिट्टी को कटाव से बचाने के लिए, वर्षाकाल में घासों के बीजों का छिड़काव किया जाता है।
जोधपुर से बाहर नौकरी के लिए जाता तो बेटे प्रमोद को आवश्यक कृषि कार्यों की जिम्मेदारी सौंप कर जाता। 28 अप्रैल, 2005 का दिन था। दवा का छिड़काव करते हुए न जाने क्या हुआ कि उसके दुष्प्रभाव से उसने अंतिम सांस ले ली। संज्ञा शून्य सा हो गया। फिर ठानी की मेहरानगढ़ की पहाड़ियों को हरियाली से आच्छादित करना, अंतिम सांस तक एकमात्र कर्मपथ रहेगा। पुत्र के विछोह को किसान वैज्ञानिक और पर्यावरण योद्धा बनकर जीवन उत्सव बना दिया। छोटा बेटा विनोद एम.ए. (राजस्थानी) करके मेहरानगढ़ में पर्यवेक्षक (उद्यान) है।
जरूर देखें मेहरानगढ़
जोधपुर आएं तो मेहरानगढ़ की पहाड़ियों का भ्रमण किए बिना आपकी यात्रा अधूरी रहेगी। चार दशकों की कोशिशों की परिणति हैं 50 हेक्टेयर क्षेत्र में पचास हजार से अधिक वृक्ष और 75 प्रकार की घासें। विस्तृत भूभाग पर हरितिमा के लिए, स्थानीय फल फूलों के पौधे रोपे। इनमें गुगल, कैर, कुम्मट, खेजड़ी, रोहिड़ा, खैर, थोर, धोक, गुंजन, नीम, पीपल, बरगद, देसी बबूल, आम, जामुन, कदंब, गुलर, बोरड़ी आदि हैं। धामण, लांपली, बेकरियो, झेरणां, कांधिया, तांतिया, घोड़ा घास आदि घासें हैं। अरावली पर्वत शृंखला के अन्तर्गत इन पहाड़ियों में वन्यजीव लौट रहे हैं। खासतौर पर 7-8 प्रकार के सर्प, पाटागोह, सेही, झाऊ, चूहा, नेवला, जंगली खरगोश, 210 तरह की चिड़ियां और अनेक प्रकार की तितलियां। देश-विदेश से पर्यटक, विशेषज्ञ और जिज्ञासु विद्यार्थी यहां बड़ी संख्या में आते हैं।
पुत्र का अक्स
मेहरानगढ़ की पहाड़ियों पर रोजाना सुबह शाम काम करते, अपने स्वर्गीय पुत्र प्रमोद का अक्स देखता हूं। एक बेटा खोया, पर पौधों को विकसित करते हजारों पुत्र वृक्षों के रूप में पाए। यहां सड़क निकालने की कोशिश सफल हो जाती तो सैकड़ों वृक्ष रूपी पुत्र खो देता। यह सब नहीं हो पाता, यदि जोधपुर के पूर्व नरेश गजसिंह जी ने इस अभियान में पहले दिन से आज तक दिल से अथाह सहयोग नहीं दिया होता।
इस पर्यावरण यात्रा में मेहरानगढ़ पर कई बार संकट आए। 2022 में मेहरानगढ़ दुर्ग तक पहुंचने के लिए, वैकल्पिक मार्ग का नक्शा जेडीए ने बनाया। इससे उद्यान के 150 पेड़ कट रहे थे। मेरे सशक्त विरोध के कारण नक्शे को संशोधित किया गया। इससे 10-15 पेड़ ही कटे।